कबीर प्रभु की लीलाएँ

रामानंद जी को तत्व ज्ञान उपदेश-  काशी में रामानंद जी एक धार्मिक ब्राह्मण थे और शास्त्रों के ज्ञाता जाने जाते थे उन्होंने 52 जगह पर अपने ऋषि शिष्यों को ज्ञान प्रचार के लिए रखा हुआ था और वे हमेशा रामानंद जी द्वारा दिए हुए ज्ञान का प्रचार करते थे उस समय परमेश्वर कबीर साहिब जी सन 1398 ईसवी में कमल के फूल पर बालक रूप में सतलोक से आकर विराजमान हुए थे लीला मय आयु में जब कबीर साहिब जी 5 वर्ष के हुए थे तो 104 वर्ष के रामानंद जी को मानसिक पूजा में मन की बात बता कर यह साबित कर दिया था कि कबीर साहेब परमात्मा ही थे इसके बाद कबीर साहिब जी ने उनको सतलोक लेकर गए पूरे सतलोक का नजारा दिखाया तो रामानन्द जी मान गए कि कबीर साहेब ही पूर्ण परमात्मा है फिर गुरु परंपरा को कायम रखने के लिए कबीर साहिब जी ने कहा कि आप मेरे गुरु बने रहेंगे और साधना जो मैं बताऊंगा वही करोगे रामानंद जी ने ऐसा ही किया





सर्वानंद को कबीर साहिब जी द्वारा आपनी शरण में लेना- सर्वानंद ब्राह्मण होने के नाते अपने आपको सभी वेद पुराण आदि शास्त्रों का ज्ञाता मानता था लेकिन वास्तविक तत्वज्ञान उनको नहीं था सर्वानंद जी की माता कबीर साहिब जी की शिष्या बन चुकी थी उन्होंने सर्वानंद जी को बहुत समझाया लेकिन वह नहीं माना अंत में एक दिन सर्वानंद जी ने कहा कि हे मां मेरा नाम मैं सर्वजीत रखना चाहता हूं आप मुझे इजाजत दे तब सर्वानंद जी की माता ने कहा कि बेटा सर्वानंद नाम भी तो बहुत अच्छा ही है सर्वानंद ने कहा कि नहीं माता सर्वजीत नाम रखने से सभी को पता चलेगा कि मैंने शास्त्रार्थ में सब को जीत लिया है इसलिए मेरा नाम सर्वजीत रख दो सर्वानंद जी की माता ने कहा कि बेटा एक विद्वान को और पराजित कर दे तब मैं तुम्हारा नाम सर्वजीत रखूंगी तब सर्वानंद ने कहा कि वह विद्वान कौन है? मां ने कहा कि मेरे गुरु जी कबीर साहेब जी को पराजित करने पर तुम्हारा नाम मैं सर्वजीत रख दूंगी तो उन्होंने कहा कि मैं आसानी से पराजित कर दूंगा वह 1 दिन कबीर साहेब जी से शास्त्रार्थ करने के लिए पूरे शास्त्र बैल पर लादकर चल पड़ा और कबीर साहिब जी से ज्ञान चर्चा नहीं कर धाराप्रवाह संस्कृत बोलता रहा श्रोता अनपढ़ होने के कारण सर्वानंद की संस्कृत बोलने की प्रवृत्ति से उनको विजेता घोषित कर दिया तब कबीर साहिब जी ने कहा कि कोई बात नहीं आप जीते और मैं हारा तब सर्वानंद ने कहा कि ऐसे मैं मानने वाला नहीं हूं एक कागज पर लिख दिया और कबीर साहिब जी के हस्ताक्षर अंगूठा करवा दिया वह कागज लेकर अपनी मां के पास पहुंचा और मां ने कहा कि तुम्हारी जीत का प्रमाण बता तब वह कागज निकाल कर पढ़ने लगा तो वहां पर लिखा हुआ था कि शास्त्रार्थ में कबीर साहिब जी जीत गए और सर्वानंद हार गया सर्वानंद ने कहा कि मां मेरे से गलती हो गई मैं दोबारा लिखकर लाता हूं और वह दुबारा कबीर साहिब जी के पास गया और लिखकर पुनः हस्ताक्षर करवा दिए लेकिन फिर भी ऐसा ही हुआ तीसरी बार उन्होंने पुनः लिखकर आया और अपने घर में घुसते हुए कहा कि मां अब मैं सुनाऊं तुम्हें कागज की तरफ देखते देखते सुनाने लगा तो उनकी आंखों के सामने अक्षर पलटते हुए नजर आए तब कबीर साहेब जी को उन्होंने पूर्ण परमात्मा माना और नाम उपदेश लेकर अपना कल्याण करवाया


          


गोरखनाथ जी को तत्व ज्ञान उपदेश करवाया- एक बार गोरखनाथ जी रामानंद जी से शास्त्रार्थ करने के लिए काशी में आए रामानंद जी ने सोचा कि गोरखनाथ जी चमत्कार करते हैं और दुनिया चमत्कार को नमस्कार करती है मेरे ज्ञान को महत्व नहीं देती इसलिए मैं हार जाऊंगा कबीर साहिब जी ने कहा कि आप चिंता न करें गोरखनाथ को आने दे गोरखनाथ जी आए तो वह चमत्कार दिखाकर त्रिशूल पर ऊपर बैठ गए कबीर साहिब जी ने कहा कि गोरखनाथ जी ज्ञान चर्चा  का विषय है चमत्कार का नहीं लेकिन वे नहीं माने तो कबीर साहिब जी ने एक धागे की कुकड़ी अपनी जेब से निकालकर हवा में फेंक दी  धागा सीधा आसमान छूते हुए खड़ा हो गया धागा खड़ा करके उनके ऊपर जाकर बैठ गए तब गोरखनाथ जी को कहा कि गोरखनाथ जी ऊपर आओ ज्ञान चर्चा करते हैं लेकिन गोरखनाथ जी की सिद्धियां फेल हो चुकी थी वह नहीं जा सके तो उन्होंने माना कि कबीर साहिब जी कोई शक्ति संपन्न महान संत हैं उन्होंने कहा कि कबीर साहिब जी मैं एक परीक्षा और लूँगा तब आपको मैं पूर्ण परमात्मा मानूँगा कबीर साहेब जी को गोरखनाथ जी गंगा नदी के किनारे लेकर गए और वह पानी में डुबकी मारते हुए मछली बन गए कबीर साहिब जी ने कुछ ही समय में उस मछली को बाहर निकाला और गोरखनाथ बनाते हुए बोले कि गोरखनाथ जी बालको जैसे खेल खेल रहे हैं तब गोरखनाथ जी ने कबीर साहेब जी को पूर्ण परमात्मा माना उनके चरण कमलों में गिरकर ज्ञान व नाम उपदेश देने की प्रार्थना करने लगा तब कबीर साहेब जी ने गोरखनाथ जी को न दिया



 








  

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